उगे हम पत्थरों के बीच भी खांटी रवानी से।
हमारा वास्ता कब था तुम्हारे खाद–पानी से ।
खड़ा हूँ सामने खुद परख लो अच्छा–बुरा जो हूँ
मुझे आँको नहीं मेरी किसी बीती कहानी से ।
सही होते हैं हम अक्सर गलत वह भी नहीं होता
तअल्लुक टूट जाते हैं जरा सी बदगुमानी से ।
उसे भी बरगदों ने स्वार्थ के कर ही दिया बौना
बड़ी उम्मीद थी सबको सियासत में जवानी से।
बहत्तर का बुढापा हो कि सत्रह का हो नाबालिग
दुशासन की उमर साबित है उसकी छेड़खानी से।
हमारा वास्ता कब था तुम्हारे खाद–पानी से ।
खड़ा हूँ सामने खुद परख लो अच्छा–बुरा जो हूँ
मुझे आँको नहीं मेरी किसी बीती कहानी से ।
सही होते हैं हम अक्सर गलत वह भी नहीं होता
तअल्लुक टूट जाते हैं जरा सी बदगुमानी से ।
उसे भी बरगदों ने स्वार्थ के कर ही दिया बौना
बड़ी उम्मीद थी सबको सियासत में जवानी से।
बहत्तर का बुढापा हो कि सत्रह का हो नाबालिग
दुशासन की उमर साबित है उसकी छेड़खानी से।
No comments:
Post a Comment