गजल

Thursday, 26 September 2013

लोग यहाँ के अफवाहों को कान नहीं देते।

सबके पाँवों को रस्ते आसान नहीं देते ।
भगवन सारे भक्तों को वरदान नहीं देते।

दहलीजों पर चहल–पहल होती बड़भागों के
हर दरवाजे पर दस्तक मेहमान नहीं देते ।

मन के अच्छे लोग लाड़ले सबके हो जाते
मँहगे घर–कपड़े हमको पहचान नहीं देते ।

संतोषों की खटिया पर मिलतीं निधड़क नींदें
लालच के बिस्तर सुख की मुस्कान नहीं देते।

इस बस्ती का भाईचारा साबुत है अब भी
लोग यहाँ के अफवाहों को कान नहीं देते।

जिज्ञासा का पार्थ चाहिये भक्ति–भाव–रथ पर
कृष्ण सभी को तो गीता का ज्ञान नहीं देते ।

राजनीति की लंका में हम आ पहुँचे शायद
दूर–दूर तक दिखलाई इंसान नहीं देते ।

Wednesday, 18 September 2013

तअल्लुक टूट जाते हैं

उगे हम पत्थरों के बीच भी खांटी रवानी से।
हमारा वास्ता कब था तुम्हारे खाद–पानी से ।

खड़ा हूँ सामने खुद परख लो अच्छा–बुरा जो हूँ
मुझे आँको नहीं मेरी किसी बीती कहानी से ।

सही होते हैं हम अक्सर गलत वह भी नहीं होता
तअल्लुक टूट जाते हैं जरा सी बदगुमानी से ।

उसे भी बरगदों ने स्वार्थ के कर ही दिया बौना
बड़ी उम्मीद थी सबको सियासत में जवानी से।

बहत्तर का बुढापा हो कि सत्रह का हो नाबालिग
दुशासन की उमर साबित है उसकी छेड़खानी से।