गजल

Saturday, 2 March 2013

मन तो तुलसी नहीं हो सका


    उनके दर दूध मेवे बरसते रहे।
    और हम जूठनों को तरसते रहे।

    अपने घर में रखी खीर औ इडलियाँ
    भात वादों के हमको परसते रहे।

   धरती तक बूँद इक भी नहीं आ सकी
   मेघ तो आसमां पर गरजते रहे ।

   हमने सौ झूठ बोले बिना ख़ौफ के
   एक सच बोलने में लरज़ते रहे ।

   मन तो तुलसी नहीं हो सका आज भी
   नाम तो राम का रोज भजते रहे ।
   

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