उनके दर दूध मेवे बरसते रहे।
और हम जूठनों को तरसते रहे।
अपने घर में रखी खीर औ इडलियाँ
भात वादों के हमको परसते रहे।
धरती तक बूँद इक भी नहीं आ सकी
मेघ तो आसमां पर गरजते रहे ।
हमने सौ झूठ बोले बिना ख़ौफ के
एक सच बोलने में लरज़ते रहे ।
मन तो तुलसी नहीं हो सका आज भी
नाम तो राम का रोज भजते रहे ।
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